Indus

Thursday, August 25, 2011

सावन


कुछ अजीब सा आलम है अहसासों का
बाहर ख़ुशी के बहते पैमानों का
दिल के भीतर दर्द के सैलाबों का
वो सावन के झूलो और ठंडी फुहारों का
हर पल हँसती गाती उन बहारो का
कुछ अजीब सा आलम है अहसासों का
आज की व्यस्त जिंदगी में बेमाना
पर बीती कुछ भीगी सुहानी यादो का
वो अदरक की चाय वो भीगे हुए हम
उन गरमा गरम पकौरों का
सच कुछ अजीब सा आलम है अहसासों का
 

6 comments:

  1. सच कुछ अजीब सा आलम है अहसासों का...Beautifully expressed.

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  2. कुछ अजीब सा आलम है अहसासों का

    शानदार अभिव्यक्ति!!

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  3. सबसे पहले तो हमारे ब्लॉग खलील जिब्रान पर पर आने और टिप्पणी देने का तहेदिल से शुक्रिया.........आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा ...........बहुत खुबसूरत लिखा है आपने.......अहसास कुछ अजीब ही होते हैं हाँ वो बात और हैं उनकी कद्र करने वाले दुनिया में बहुत कम लोग मिलते हैं.......आज ही आपको फॉलो कर रहा हूँ ताकि आगे भी साथ बना रहे........आपसे गुज़ारिश है हमारे अन्य ब्लॉग भी देखे और पसंद आने पर फॉलो करके उत्साह बढ़ाएं...........शुक्रिया|

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  4. वो अदरक की चाय वो भीगे हुए हम
    उन गरमा गरम पकौरों का
    सच कुछ अजीब सा आलम है अहसासों का
    ..waah.. barshat ke mausam mein sundar fuhar..
    badiya bhavbhavykti..
    haardik shubhkamna!

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